Pratidin Ek Kavita

लेकर सीधा नारा | शमशेर बहादुर सिंह

लेकर सीधा नारा 
कौन पुकारा 
अंतिम आशाओं की संध्याओं से? 
पलकें डूबी ही-सी थीं— 
पर अभी नहीं; 
कोई सुनता-सा था मुझे 
कहीं; 
फिर किसने यह, सातों सागर के पार 
एकाकीपन से ही, मानो—हार, 
एकाकी उठ मुझे पुकारा 
कई बार? 
मैं समाज तो नहीं; न मैं कुल 
जीवन; 
कण-समूह में हूँ मैं केवल 
एक कण। 
—कौन सहारा! 
मेरा कौन सहारा! 

What is Pratidin Ek Kavita?

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।

लेकर सीधा नारा | शमशेर बहादुर सिंह

लेकर सीधा नारा
कौन पुकारा
अंतिम आशाओं की संध्याओं से?
पलकें डूबी ही-सी थीं—
पर अभी नहीं;
कोई सुनता-सा था मुझे
कहीं;
फिर किसने यह, सातों सागर के पार
एकाकीपन से ही, मानो—हार,
एकाकी उठ मुझे पुकारा
कई बार?
मैं समाज तो नहीं; न मैं कुल
जीवन;
कण-समूह में हूँ मैं केवल
एक कण।
—कौन सहारा!
मेरा कौन सहारा!