Pratidin Ek Kavita

संकटग्रस्त।  विवेक निराला 

भूमंडलीकरण के इस युग में 
संकट ही संकट थे 
स्थानीय लोग कुछ वैश्विक संकटों से जूझ रहे थे 
और वैश्विक लोग स्थानीय संकटों से।

मेरा संकट मेरी टूटी खाट थी
 जब कि मैं स्वप्न में था। 
किसानों के पास कर्ज था और उद्योगपतियों के पास मर्ज 
सरकार को किसी से हर्ज न था।

खुदगर्ज सिर्फ़ हिन्दी का कवि था लेकिन वह भी संकट से दुबराया था।
न उसकी किताब बिकती थी और न उसकी आत्मा। 
उसके शरीर में जन्म से एक ही गुर्दा था 
वह उसे भी नहीं बेच सकता था बस इसीलिए मुर्दा था।

What is Pratidin Ek Kavita?

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।

संकटग्रस्त। विवेक निराला

भूमंडलीकरण के इस युग में
संकट ही संकट थे
स्थानीय लोग कुछ वैश्विक संकटों से जूझ रहे थे
और वैश्विक लोग स्थानीय संकटों से।

मेरा संकट मेरी टूटी खाट थी
जब कि मैं स्वप्न में था।
किसानों के पास कर्ज था और उद्योगपतियों के पास मर्ज
सरकार को किसी से हर्ज न था।

खुदगर्ज सिर्फ़ हिन्दी का कवि था लेकिन वह भी संकट से दुबराया था।
न उसकी किताब बिकती थी और न उसकी आत्मा।
उसके शरीर में जन्म से एक ही गुर्दा था
वह उसे भी नहीं बेच सकता था बस इसीलिए मुर्दा था।