Pratidin Ek Kavita

लफ़्ज़ों का पुल | निदा फ़ाज़ली

मस्जिद का गुम्बद सूना है
मंदिर की घंटी ख़ामोश

जुज़दानों में लिपटे आदर्शों को
दीमक कब की चाट चुकी है

रंग
गुलाबी

नीले
पीले

कहीं नहीं हैं
तुम उस जानिब

मैं इस जानिब
बीच में मीलों गहरा ग़ार

लफ़्ज़ों का पुल टूट चुका है
तुम भी तन्हा

मैं भी तन्हा

What is Pratidin Ek Kavita?

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।

लफ़्ज़ों का पुल | निदा फ़ाज़ली

मस्जिद का गुम्बद सूना है
मंदिर की घंटी ख़ामोश

जुज़दानों में लिपटे आदर्शों को
दीमक कब की चाट चुकी है

रंग
गुलाबी

नीले
पीले

कहीं नहीं हैं
तुम उस जानिब

मैं इस जानिब
बीच में मीलों गहरा ग़ार

लफ़्ज़ों का पुल टूट चुका है
तुम भी तन्हा

मैं भी तन्हा