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कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।
दीवार । साक़ी फ़ारुक़ी
रगों में नाच रहा है इक आतिशीं ज़हराब
आतिशीं: अग्निमय ज़हराब: ज़हरीला पानी
तिरी तलाश फ़क़त जिस्म का तक़ाज़ा है
तिरी तलब के जहन्नम में जल रहा है बदन
तलब: तलाश
लहू पुकारता है क्या सुना नहीं तू ने
कि मैं ने रूह की दीवार ही गिरा दी है