Pratidin Ek Kavita

बे-आवाज़ । वीरू सोनकर

जहाँ भाषा चूकती है
और अर्थ बे-आवाज़ ही रह जाते हैं

जहाँ शब्दों को कोई ईश्वर नहीं मानता
हम वहाँ मिलेंगे

और अपनी चुप्पियों में कहेंगे
कि आवाज़ एक ख़लल है

इस दुनिया को बिना किसी शर्त अब चुप हो जाना चाहिए!

What is Pratidin Ek Kavita?

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।

बे-आवाज़ । वीरू सोनकर

जहाँ भाषा चूकती है
और अर्थ बे-आवाज़ ही रह जाते हैं

जहाँ शब्दों को कोई ईश्वर नहीं मानता
हम वहाँ मिलेंगे

और अपनी चुप्पियों में कहेंगे
कि आवाज़ एक ख़लल है

इस दुनिया को बिना किसी शर्त अब चुप हो जाना चाहिए!