Pratidin Ek Kavita

गांव-देहात की बेटियां । नीरा परमार

लू के थपेड़े हाड़ कंपाते जाड़े
भरी बरसात में
जंगल-पहाड़ नदी-नाले को
लांघकर
स्कूल जाती हैं
दूर-दराज बियाबान में बसे
गांव-देहात की बेटियां

न तन ढंकने लायक कपड़े
न पैरों में ढंग की चप्पल
पौ फटते दो कौर बासी भात पेट में डाल
घर गृहस्थी छोटे भाई-बहन
मां-बाप के सौ टंटे बोरे
बदरंग तख्ती के संग
ब्लैकबोर्ड पर उभरते ककहरे से जोड़
नाता
अंधेरे में उम्मीद की कंदील
जलाती हैं!

What is Pratidin Ek Kavita?

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।

गांव-देहात की बेटियां । नीरा परमार

लू के थपेड़े हाड़ कंपाते जाड़े
भरी बरसात में
जंगल-पहाड़ नदी-नाले को
लांघकर
स्कूल जाती हैं
दूर-दराज बियाबान में बसे
गांव-देहात की बेटियां

न तन ढंकने लायक कपड़े
न पैरों में ढंग की चप्पल
पौ फटते दो कौर बासी भात पेट में डाल
घर गृहस्थी छोटे भाई-बहन
मां-बाप के सौ टंटे बोरे
बदरंग तख्ती के संग
ब्लैकबोर्ड पर उभरते ककहरे से जोड़
नाता
अंधेरे में उम्मीद की कंदील
जलाती हैं!