Pratidin Ek Kavita

मेरा उसका परिचय इतना । अंसार कम्बरी

मेरा उसका परिचय इतना
वो नदिया है, मैं मरुथल हूँ।

उसकी सीमा सागर तक है
मेरा कोई छोर नहीं है।
मेरी प्यास चुरा ले जाए
ऐसा कोई चोर नहीं है।

मेरा उसका इतना नाता
वो ख़ुशबू है, मैं संदल हूँ।

उस पर तैरें दीप शिखाएँ
सूनी सूनी मेरी राहें।
उसके तट पर भीड़ लगी है
कौन करेगा मुझसे बातें।

मेरा उसका अंतर इतना
वो बस्ती है, मैं जंगल हूँ।

उसमें एक निरन्तरता है
मैं तो स्थिर हूँ जनम जनम से।
वो है साथ साथ ऋतुओं के
मेरा क्या रिश्ता मौसम से।

मेरा उसका जीवन इतना
वो इक युग है मैं इक पल हूँ।

What is Pratidin Ek Kavita?

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।

मेरा उसका परिचय इतना । अंसार कम्बरी

मेरा उसका परिचय इतना
वो नदिया है, मैं मरुथल हूँ।

उसकी सीमा सागर तक है
मेरा कोई छोर नहीं है।
मेरी प्यास चुरा ले जाए
ऐसा कोई चोर नहीं है।

मेरा उसका इतना नाता
वो ख़ुशबू है, मैं संदल हूँ।

उस पर तैरें दीप शिखाएँ
सूनी सूनी मेरी राहें।
उसके तट पर भीड़ लगी है
कौन करेगा मुझसे बातें।

मेरा उसका अंतर इतना
वो बस्ती है, मैं जंगल हूँ।

उसमें एक निरन्तरता है
मैं तो स्थिर हूँ जनम जनम से।
वो है साथ साथ ऋतुओं के
मेरा क्या रिश्ता मौसम से।

मेरा उसका जीवन इतना
वो इक युग है मैं इक पल हूँ।