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कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।
मेरा घर, उसका घर / आग्नेय
एक चिड़िया
प्रतिदिन मेरे घर आती है
जानता नहीं हूँ उसका नाम
सिर्फ़ पहचानता हूँ उसको
वह चहचहाती है देर तक
ढूँढती है दाने :
और फिर उड़ जाती है
अपने घर की ओर
पर उसका घर कहाँ है?
घर है भी उसका
या नहीं है उसका घर?
यदि उसका घर है
तब भी उसका घर
मेरे घर जैसा नहीं होगा
लहूलुहान और हाहाकार से भरा
फिर क्यों आती है
वह मेरे घर
प्रतिदिन चहचहाने