Pratidin Ek Kavita

बिलबिलाता सूर्य।  वाज़दा खान 

डर और दबाव के 
घटाटोप अनधकार में
बिलबिलाता सूर्य,
कितना भीतर से
जन्मा है सृष्टि के?

भरी दुपहरी के आखिरी पलों में भी
चढ़ नहीं पाया आकाश

बन जाता आकाश सुनहरा तो
सूर्य की रश्मियां अपराजेय हो जातीं
पहुंच जातीं उन नसों में
जहां डर, दबाव और ख़ून एकमेक होकर
बहता है।


What is Pratidin Ek Kavita?

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।

बिलबिलाता सूर्य। वाज़दा खान

डर और दबाव के
घटाटोप अनधकार में
बिलबिलाता सूर्य,
कितना भीतर से
जन्मा है सृष्टि के?

भरी दुपहरी के आखिरी पलों में भी
चढ़ नहीं पाया आकाश

बन जाता आकाश सुनहरा तो
सूर्य की रश्मियां अपराजेय हो जातीं
पहुंच जातीं उन नसों में
जहां डर, दबाव और ख़ून एकमेक होकर
बहता है।