Pratidin Ek Kavita

सोचना और होना। नीलेश रघुवंशी

बनाना चाहती थी घर पहाड़ों के ऊपर
डर गई लेकिन जंगली जानवरों और हवाओं से..
बहुत प्यार है पानी से सोचा क्यों न घर बनाऊं  समुद्र तट पर
लेकिन डर गई तूफान और लहरों से..
फिर सोचा कहीं एकांत में शहर के कोलाहल से दूर
लेकिन बिछड़ने से पहले दोस्तों की याद ने ऐसा करने से रोका
फिर जाने कैसे बिना कोई ना नुकुर किए बन गया घर
सोचती हूँ अब खिड़की से झाँकते
संसार को त्यागने से अच्छा है माया-मोह त्यागकर संसार में रहना
मेरी इस बात पर हँसता है बाज़ार खूब
खिड़की भी तो है उसी के भीतर
हवाओं से डरी जानवरों से डरी तूफ़ान और लहरों से भी डरी
जिससे डरना चाहिए था उसी की गोद में जाकर गिरी..

What is Pratidin Ek Kavita?

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।

सोचना और होना। नीलेश रघुवंशी

बनाना चाहती थी घर पहाड़ों के ऊपर
डर गई लेकिन जंगली जानवरों और हवाओं से..
बहुत प्यार है पानी से सोचा क्यों न घर बनाऊं समुद्र तट पर
लेकिन डर गई तूफान और लहरों से..
फिर सोचा कहीं एकांत में शहर के कोलाहल से दूर
लेकिन बिछड़ने से पहले दोस्तों की याद ने ऐसा करने से रोका
फिर जाने कैसे बिना कोई ना नुकुर किए बन गया घर
सोचती हूँ अब खिड़की से झाँकते
संसार को त्यागने से अच्छा है माया-मोह त्यागकर संसार में रहना
मेरी इस बात पर हँसता है बाज़ार खूब
खिड़की भी तो है उसी के भीतर
हवाओं से डरी जानवरों से डरी तूफ़ान और लहरों से भी डरी
जिससे डरना चाहिए था उसी की गोद में जाकर गिरी..