Pratidin Ek Kavita

पाव भर कद्दू से बना लेती है रायता | ममता कालिया

एक नदी की तरह
सीख गई है घरेलू औरत
दोनों हाथों में बर्तन थाम
चौकें से बैठक तक लपकना
जरा भी लड़खड़ाए बिना

एक साँस में वह चढ़ जाती है सीढ़ियाँ‌
और घुस जाती है लोकल में
धक्का मुक्की की परवाह किए बिना
राशन की कतार उसे कभी लम्बी नहीं लगी
रिक्शा न मिले
तो दोनों हाथों में झोले लटका
वह पहुँच जाती है अपने घर
एक भी बार पसीना पोंछे बिना

एक कटोरी दही से तीन कटोरी रायता
बना लेती है खाँटी घरेलू औरत
पाव भर कद्दू में घर भर को खिला लेती है
ज़रा भी घबराए बिना!

What is Pratidin Ek Kavita?

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।

पाव भर कद्दू से बना लेती है रायता | ममता कालिया

एक नदी की तरह
सीख गई है घरेलू औरत
दोनों हाथों में बर्तन थाम
चौकें से बैठक तक लपकना
जरा भी लड़खड़ाए बिना

एक साँस में वह चढ़ जाती है सीढ़ियाँ‌
और घुस जाती है लोकल में
धक्का मुक्की की परवाह किए बिना
राशन की कतार उसे कभी लम्बी नहीं लगी
रिक्शा न मिले
तो दोनों हाथों में झोले लटका
वह पहुँच जाती है अपने घर
एक भी बार पसीना पोंछे बिना

एक कटोरी दही से तीन कटोरी रायता
बना लेती है खाँटी घरेलू औरत
पाव भर कद्दू में घर भर को खिला लेती है
ज़रा भी घबराए बिना!