Pratidin Ek Kavita

विस्मृति का फूल । गोबिंद प्रसाद

...मैं हूँ
मैं हूँ किसी का

...हूँ किसी का
सपना

देखा हुआ अनदेखा
अपना

स्मृति में जैसे बसा-किसी की
विस्मृति का फूल

बन, खिलने की हसरत में
दिन-रात तपना

पहरों-पहरों, देह की देहरी पर
रह-रहकर अंगार-सा

दहकना

What is Pratidin Ek Kavita?

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।

विस्मृति का फूल । गोबिंद प्रसाद

...मैं हूँ
मैं हूँ किसी का

...हूँ किसी का
सपना

देखा हुआ अनदेखा
अपना

स्मृति में जैसे बसा-किसी की
विस्मृति का फूल

बन, खिलने की हसरत में
दिन-रात तपना

पहरों-पहरों, देह की देहरी पर
रह-रहकर अंगार-सा

दहकना