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कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।
प्रेत लोक में/ मक्सिम तान्क
अनुवाद: रमेश कौशिक
एक बार मैं
प्रेत-लोक में गया
दांते के संग
उसके अँधियारे घेरों में
घूम रहे थे हम
तभी कवि रुक गया
अचम्भे में आ
विश्वास नहीं था
जो कुछ उसने देखा
पहली बार
अँधेरे की वह दुनिया
दुःख से बोझिल
प्रेतों की दुनिया
जब देखी थी उसने
तब से अब तक
जाने कितने
और नए घेरे बन आए
जो प्राचीन काल में अनजाने थे।