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कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।
दिन बौने हो गए | उमाकांत मालवीय
रातें लम्बी हुईं
दिन बौने हो गए ।
ठिगने कद वाले दिन
लम्बी परछाइयाँ
धूप की इकाई पर
तिमिर की दहाइयाँ
रातें पत्तल हुईं
दिन दौने हो गए ।
कुहरों पर लिखी गई
विष भरी कहानियाँ
नीली पड़ने लगी
सुबह की जवानियाँ
रातें आँगन हुईं
दिन कौने हो गए ।
बर्फ़ीले ओठों पर
शब्द ठिठुरने लगे
नाकाफ़ी ओढ़ने
बिछौने जुड़ने लगे
रातें अजगर हुईं
दिन छौने हो गए ।