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कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।
कलकत्ता के एक ट्राम में मधुबनी पेंटिंग।ज्ञानेन्द्रपति
अपनी कटोरियों के रंग उँड़ेलते
शहर आए हैं ये गाँव के फूल
धीर पदों से शहर आई है
सुदूर मिथिला की सिया सुकुमारी
हाथ वाटिका में सखियों संग गूँथा
वरमाल
जानकी !
पहचान गया तुम्हें में
यहाँ इस दस बजे की भभक:भीड़ में
अपनी बाँहें अपनी जेबें सँभालता
पहचान गया तुम्हें मैं कि जैसे मेरे गाँव की बिटिया
आँगन से निकल
पार कर नदी-नगर
आई इस महानगर में
रोज़ी -रोटी के महासमर में