Pratidin Ek Kavita

अब्बास मियाँ | नीरव 

पंद्रह बीघे की खेती अकेले संभालने वाले अब्बास मियाँ 
हमारे हरवाहे थे
हम काका कहते थे उन्हें
हम सुनते बड़े हुए थे काका खानदानी
शहनाई वादक थे
अपने ज़माने में बहुत मशहूर
दूर-दूर तक उनके सुरों की गूंज थी
हमारे बाबा भी एक क़िस्सा बताते थे
काशी में काका को एक दफे उस्ताद बिस्मिल्लाह खां के सामने
शहनाई बजाने का मौका मिला था
और उस्ताद ने पीठ थपथपाकर कहा था -
उसकी बड़ी नेमत है हुनर
संभालना
उसकी नेमत जितनी बड़ी थी
उससे बड़ी थी उनकी घर-गृहस्थी
और घर गृहस्थी से भी बड़ी थी उनकी पुश्तैनी दरिद्रता
सो उन्हें रखनी पड़ी अपनी जान से भी प्रिय
शहनाई
और करनी पड़ी हरवाही
बाद उसके कछ पुराने शौकिया लोग बुलाते रहे शादी-ब्याह  में
काका को
शहनाई बजवाने
पर एक वक्त के बाद सहालग भी छट गया
हम छोटे थे तब इतना नहीं समझते थे
लेकिन काका जब कहते
हमारे साथ ही हमारा ये खानदानी हुनर बिला जाएगा
तब हम भी उनकी तरह मलाल के किसी अंधेरे में खो जाते थे
अच्छे से याद है बाबा का जब देहांत हुआ था 
काका ने उठाई थी शहनाई
और माटी जब उठी तब छेड़ा था राग
फिर क्या परिचित क्या अपरिचित
सबके रूदन को समेट लिया था उन्होंने अपनी शहनाई में
बादल भी बरसे थे बाबा की शवयात्रा में
सबसे बड़ी थी उसकी नेमत
लेकिन उससे भी बड़ा था कुछ
ऐसी विदाई जिसमें सबकी आँख से पानी बरस रहा था
काका बजा रहे थे
न जाने कौनसा दुख

What is Pratidin Ek Kavita?

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।

अब्बास मियाँ | नीरव

पंद्रह बीघे की खेती अकेले संभालने वाले अब्बास मियाँ
हमारे हरवाहे थे
हम काका कहते थे उन्हें
हम सुनते बड़े हुए थे काका खानदानी
शहनाई वादक थे
अपने ज़माने में बहुत मशहूर
दूर-दूर तक उनके सुरों की गूंज थी
हमारे बाबा भी एक क़िस्सा बताते थे
काशी में काका को एक दफे उस्ताद बिस्मिल्लाह खां के सामने
शहनाई बजाने का मौका मिला था
और उस्ताद ने पीठ थपथपाकर कहा था -
उसकी बड़ी नेमत है हुनर
संभालना
उसकी नेमत जितनी बड़ी थी
उससे बड़ी थी उनकी घर-गृहस्थी
और घर गृहस्थी से भी बड़ी थी उनकी पुश्तैनी दरिद्रता
सो उन्हें रखनी पड़ी अपनी जान से भी प्रिय
शहनाई
और करनी पड़ी हरवाही
बाद उसके कछ पुराने शौकिया लोग बुलाते रहे शादी-ब्याह में
काका को
शहनाई बजवाने
पर एक वक्त के बाद सहालग भी छट गया
हम छोटे थे तब इतना नहीं समझते थे
लेकिन काका जब कहते
हमारे साथ ही हमारा ये खानदानी हुनर बिला जाएगा
तब हम भी उनकी तरह मलाल के किसी अंधेरे में खो जाते थे
अच्छे से याद है बाबा का जब देहांत हुआ था
काका ने उठाई थी शहनाई
और माटी जब उठी तब छेड़ा था राग
फिर क्या परिचित क्या अपरिचित
सबके रूदन को समेट लिया था उन्होंने अपनी शहनाई में
बादल भी बरसे थे बाबा की शवयात्रा में
सबसे बड़ी थी उसकी नेमत
लेकिन उससे भी बड़ा था कुछ
ऐसी विदाई जिसमें सबकी आँख से पानी बरस रहा था
काका बजा रहे थे
न जाने कौनसा दुख