Pratidin Ek Kavita

नफ़ी | किश्वर नाहीद

मैं थी आईना फ़रोश* (विक्रेता)
कोह-ए-उम्मीद* (आशा का पहाड़) के दामन में
अकेली थी ज़ियाँ* (नुक़्सान) कोशिश
सुरय्या की थी हम-दोश
मुझे हर रोज़ हमा-वक़्त* (हर समय) थी बस अपनी ख़बर
मैं थी ख़ुद अपने में मदहोश

मैं वो तन्हा थी
जिसे पैर मिलाने का सलीक़ा भी न था
मैं वो ख़ुद-बीं* (आत्म-मुग्ध) थी
जिसे अपने हर इक रुख़ से मोहब्बत थी बहुत
मैं वो ख़ुद-सर* (अवज्ञाकारी) थी
जिसे हाँ के उजालों से बहुत नफ़रत थी
मैं ने फिर क़त्ल किया ख़ुद को
पिया अपना लहू हँसती रही
लोग कहते हैं हँसी ऐसी सुनी तक भी नहीं

What is Pratidin Ek Kavita?

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।

नफ़ी | किश्वर नाहीद

मैं थी आईना फ़रोश* (विक्रेता)
कोह-ए-उम्मीद* (आशा का पहाड़) के दामन में
अकेली थी ज़ियाँ* (नुक़्सान) कोशिश
सुरय्या की थी हम-दोश
मुझे हर रोज़ हमा-वक़्त* (हर समय) थी बस अपनी ख़बर
मैं थी ख़ुद अपने में मदहोश

मैं वो तन्हा थी
जिसे पैर मिलाने का सलीक़ा भी न था
मैं वो ख़ुद-बीं* (आत्म-मुग्ध) थी
जिसे अपने हर इक रुख़ से मोहब्बत थी बहुत
मैं वो ख़ुद-सर* (अवज्ञाकारी) थी
जिसे हाँ के उजालों से बहुत नफ़रत थी
मैं ने फिर क़त्ल किया ख़ुद को
पिया अपना लहू हँसती रही
लोग कहते हैं हँसी ऐसी सुनी तक भी नहीं