Pratidin Ek Kavita

दिन घटेंगे | दिनेश सिंह

जनम के सिरजे हुए दुख
उम्र बन-बनकर कटेंगे
ज़िन्दगी के दिन घटेंगे

कुआँ अन्धा बिना पानी
घूमती यादें पुरानी
प्यास का होना वसन्ती
तितलियों से छेड़खानी

झरे फूलों से पहाड़े --
गन्ध के कब तक रटेंगे ?
ज़िन्दगी के दिन घटेंगे

चढ़ गए सारे नसेड़ी
वक़्त की मीनार टेढ़ी
'गिर रही है -- गिर रही है' --
हवाओं ने तान छेड़ी

मचेगी भगदड़ कि कितने स्वप्न
लाशों से पटेंगे ?
ज़िन्दगी के दिन घटेंगे

परिन्दे फिर भी चमन में
खेत-बागों में कि वन में
चहचहाएँगे
नदी बहती रहेगी उसी धुन में
चप्पुओं के स्वर लहर बनकर
कछारों तक उठेंगे
ज़िन्दगी के दिन घटेंगे

What is Pratidin Ek Kavita?

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।

दिन घटेंगे | दिनेश सिंह

जनम के सिरजे हुए दुख
उम्र बन-बनकर कटेंगे
ज़िन्दगी के दिन घटेंगे

कुआँ अन्धा बिना पानी
घूमती यादें पुरानी
प्यास का होना वसन्ती
तितलियों से छेड़खानी

झरे फूलों से पहाड़े --
गन्ध के कब तक रटेंगे ?
ज़िन्दगी के दिन घटेंगे

चढ़ गए सारे नसेड़ी
वक़्त की मीनार टेढ़ी
'गिर रही है -- गिर रही है' --
हवाओं ने तान छेड़ी

मचेगी भगदड़ कि कितने स्वप्न
लाशों से पटेंगे ?
ज़िन्दगी के दिन घटेंगे

परिन्दे फिर भी चमन में
खेत-बागों में कि वन में
चहचहाएँगे
नदी बहती रहेगी उसी धुन में
चप्पुओं के स्वर लहर बनकर
कछारों तक उठेंगे
ज़िन्दगी के दिन घटेंगे