कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।
दो मिनट का मौन | केदारनाथ सिंह
भाइयो और बहनों
यह दिन डूब रहा है।
इस डूबते हुए दिन पर
दो मिनट का मौन
जाते हुए पक्षी पर
रुके हुए जल पर
घिरती हुई रात पर
दो मिनट का मौन
जो है उस पर
जो नहीं है उस पर
जो हो सकता था उस पर
दो मिनट का मौन
गिरे हुए छिलके पर
टूटी हुई घास पर
हर योजना पर
हर विकास पर
दो मिनट का मौन
इस महान शताब्दी पर
महान शताब्दी के
महान इरादों पर
महान शब्दों पर
और महान वादों पर
दो मिनट का मौन
भाइयो और बहनों
इस महान विशेषण पर
दो मिनट का मौन