Pratidin Ek Kavita

मछली बोली कवि से |  के. सच्चिदानंदन
अनुवाद : गिरधर राठी

  उपमा मुझे मत दो स्त्री की आँख की
स्त्री हूँ मैं स्वयं, पूरी, संपूर्ण

मुझे नहीं धरना है भेष जलपरियों का
मैं नहीं ढोऊँगी नारी का भारी सिर

मुझसे अँगूठी निगलवा कर
करा नहीं पाओगे मछुए का इंतज़ार

मैं नहीं कोई अवतार
जो लाए वेद को उबार।

वापस पहुँचा दो मुझे जल में तुम
कच्चा ही,

तड़पना पड़े न मुझे रेत में
बनकर प्रतीक या

फिर कोई रूपक।


What is Pratidin Ek Kavita?

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।

मछली बोली कवि से | के. सच्चिदानंदन
अनुवाद : गिरधर राठी

उपमा मुझे मत दो स्त्री की आँख की
स्त्री हूँ मैं स्वयं, पूरी, संपूर्ण

मुझे नहीं धरना है भेष जलपरियों का
मैं नहीं ढोऊँगी नारी का भारी सिर

मुझसे अँगूठी निगलवा कर
करा नहीं पाओगे मछुए का इंतज़ार

मैं नहीं कोई अवतार
जो लाए वेद को उबार।

वापस पहुँचा दो मुझे जल में तुम
कच्चा ही,

तड़पना पड़े न मुझे रेत में
बनकर प्रतीक या

फिर कोई रूपक।