Pratidin Ek Kavita

ज़िंदा रहें तो क्या है जो मर जाएँ हम तो क्या । मुनीर नियाज़ी

ज़िंदा रहें तो क्या है जो मर जाए हम तो क्या। 
दुनिया में ख़ामोशी से गुज़र जाए हम तो क्या। 

हस्ती ही अपनी क्या है ज़माने के सामने,
एक ख़्वाब हैं जहां में बिखर जाए हम तो क्या। 

अब कौन मुंतज़िर (इंतज़ार करने वाला) है हमारे लिये वहाँ,
शाम आ गई है लौट के घर जाएँ हम तो क्या। 

दिल की ख़लिश तो साथ रहेगी तमाम उम्र,
दरिया-ए-ग़म के पार उतर जाएँ हम तो क्या। 


What is Pratidin Ek Kavita?

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।

ज़िंदा रहें तो क्या है जो मर जाएँ हम तो क्या । मुनीर नियाज़ी

ज़िंदा रहें तो क्या है जो मर जाए हम तो क्या।
दुनिया में ख़ामोशी से गुज़र जाए हम तो क्या।

हस्ती ही अपनी क्या है ज़माने के सामने,
एक ख़्वाब हैं जहां में बिखर जाए हम तो क्या।

अब कौन मुंतज़िर (इंतज़ार करने वाला) है हमारे लिये वहाँ,
शाम आ गई है लौट के घर जाएँ हम तो क्या।

दिल की ख़लिश तो साथ रहेगी तमाम उम्र,
दरिया-ए-ग़म के पार उतर जाएँ हम तो क्या।