Pratidin Ek Kavita

एक समय था- रघुवीर सहाय

एक समय था मैं बताता था कितना
नष्ट हो गया है अब मेरा पूरा समाज

तब मुझे ज्ञात था कि लोग अभी व्यग्न हैं
बनाने को फिर अपना परसों कल और आज

आज पतन की दिशा बताने पर शक्तिवान
करते हैं कोलाहल तोड़ दो तोड़ दो

तोड़ दो झोंपड़ी जो खड़ी है अधबनी
फ़िज़ूल था बनाना ज़िद समता की छोड़ दो

एक दूसरा समाज बलवान लोगों का
आज बनाना ही पुनर्निर्माण है

जिनका अधिकार छीन जिन्हें किया पराधीन
उनको जी लेने का मिलता प्रतिदान है।

What is Pratidin Ek Kavita?

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।

एक समय था- रघुवीर सहाय

एक समय था मैं बताता था कितना
नष्ट हो गया है अब मेरा पूरा समाज

तब मुझे ज्ञात था कि लोग अभी व्यग्न हैं
बनाने को फिर अपना परसों कल और आज

आज पतन की दिशा बताने पर शक्तिवान
करते हैं कोलाहल तोड़ दो तोड़ दो

तोड़ दो झोंपड़ी जो खड़ी है अधबनी
फ़िज़ूल था बनाना ज़िद समता की छोड़ दो

एक दूसरा समाज बलवान लोगों का
आज बनाना ही पुनर्निर्माण है

जिनका अधिकार छीन जिन्हें किया पराधीन
उनको जी लेने का मिलता प्रतिदान है।