कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।
जंग । बलराज कोमल
तीरगी में भयानक सदाएँ उठीं
और धुआँ सा फ़ज़ाओं में लहरा गया
मौत की सी सपेदी उफ़ुक़-ता-उफ़ुक़
तिलमिलाने लगी
और फिर एक दम
सिसकियाँ चार-सू थरथरा कर उठीं
एक माँ सीना-कूबी से थक कर गिरी
इक बहन अपनी आँखों में आँसू लिए
राह तकती रही
एक नन्हा खिलौने की उम्मीद में
सर को दहलीज़ पर रख के सोता रहा
एक मा'सूम सूरत दरीचे से सर को लगाए हुए
ख़्वाब बुनती रही
मुंतज़िर थीं निगाहें बड़ी देर से
मुंतज़िर ही रहीं
मौत की सी सपेदी उफ़ुक़-ता-उफ़ुक़
तिलमिलाती रही