Pratidin Ek Kavita

प्यार करता हूँ | कैलाश वाजपेयी

माथे की आँच से

डोरा सुलगता है
मोम नहीं गलता

देह बंद नदिया
उफनाती है

नीली फिर काली फिर श्वेत हो जाती है
दार्शनिक उँगलियों से

चितकबरे फूल नहीं
झरती है राख

असहाय होता हूँ
जब-जब रिक्त होता हूँ

प्यार करता हूँ
वहीं एक सीढ़ी है नीचे उतरकर

दुनिया कहलाने की।
सागर के नीचे दरार है

किरन कतराती है
पत्थर सरकाकर

राह निकल जाती है
हवा की चोट से

बाँस झुलस जाता है
हरा-भरा अंधकार होता हूँ

प्यार करता हूँ
वही एक शर्त है

ज़िंदा रह जाने की।


What is Pratidin Ek Kavita?

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।

प्यार करता हूँ | कैलाश वाजपेयी

माथे की आँच से

डोरा सुलगता है
मोम नहीं गलता

देह बंद नदिया
उफनाती है

नीली फिर काली फिर श्वेत हो जाती है
दार्शनिक उँगलियों से

चितकबरे फूल नहीं
झरती है राख

असहाय होता हूँ
जब-जब रिक्त होता हूँ

प्यार करता हूँ
वहीं एक सीढ़ी है नीचे उतरकर

दुनिया कहलाने की।
सागर के नीचे दरार है

किरन कतराती है
पत्थर सरकाकर

राह निकल जाती है
हवा की चोट से

बाँस झुलस जाता है
हरा-भरा अंधकार होता हूँ

प्यार करता हूँ
वही एक शर्त है

ज़िंदा रह जाने की।