Pratidin Ek Kavita

तुमको निहारता हूँ सुबह से ऋतम्बरा।  दुष्यंत कुमार 

तुमको निहारता हूँ सुबह से ऋतम्बरा,
अब शाम हो रही है मगर मन नहीं भरा।

ख़रगोश बन के दौड़ रहे हैं तमाम ख़्वाब,
फिरता है चाँदनी में कोई सच डरा-डरा।

पौधे झुलस गए हैं मगर एक बात है,
मेरी नज़र में अब भी चमन है हरा-भरा।

लंबी सुरंग-सी है तेरी ज़िंदगी तो बोल,
मैं जिस जगह खड़ा हूँ वहाँ है कोई सिरा।

माथे पे रखके हाथ बहुत सोचते हो तुम,
गंगा क़सम बताओ हमें क्या है माजरा।


What is Pratidin Ek Kavita?

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।

तुमको निहारता हूँ सुबह से ऋतम्बरा। दुष्यंत कुमार

तुमको निहारता हूँ सुबह से ऋतम्बरा,
अब शाम हो रही है मगर मन नहीं भरा।

ख़रगोश बन के दौड़ रहे हैं तमाम ख़्वाब,
फिरता है चाँदनी में कोई सच डरा-डरा।

पौधे झुलस गए हैं मगर एक बात है,
मेरी नज़र में अब भी चमन है हरा-भरा।

लंबी सुरंग-सी है तेरी ज़िंदगी तो बोल,
मैं जिस जगह खड़ा हूँ वहाँ है कोई सिरा।

माथे पे रखके हाथ बहुत सोचते हो तुम,
गंगा क़सम बताओ हमें क्या है माजरा।