कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।
आऊँगा | लीलाधर जगूड़ी
नए अनाज की ख़ुशबू का पुल पार करके
मैं तुम्हारे पास आऊँगा
ज्यों ही तुम मेरे शब्दों के पास आओगे
मैं तुम्हारे पास आऊँगा
जैसे बादल पहाड़ की चोटी के पास आता है।
और लिपट जाता है
जिसे वे ही देख पाते हैं जिनकी गर्दनें उठी हुई हों।
मैं वहाँ तुम्हारे दिमाग़ में
जहाँ एक मरुस्थल है। आना चाहता हूँ
मैं आऊँगा। मगर उस तरह नहीं
बर्बर लोग जैसे कि पास आते हैं
उस तरह भी नहीं
गोली जैसे कि निशाने पर लगती है
मैं आऊँगा। आऊँगा तो उस तरह
जैसे कि हारे हुए, थके हुए में दम आता है।