Pratidin Ek Kavita

माँ । पद्मा सचदेव

बुलाने के लिए कई नाम हैं

जिसे पुकारो बोलता भी है
पर एक नाम ऐसा है जिसे पुकारो तो

सब चौकन्ने हो जाते हैं
सभी सोचते हैं ये नाम मेरे लिए तो नहीं

माँ... माँ... माँ...
ओ लड़के

ओ बेटा
वह मेरी बेटी

कहाँ मर गई हो
माँ माँ माँ कहता जब कोई बच्चा

गली में से निकलता है
सड़क पार करता है

या पहाड़ चढ़ता है
पहाड़ उतरकर आँगन में आ खड़ा होता है

तब माँ एकदम सुबह के गुलाब की तरह
खिल उठती है

दोनों दरवाज़े थाम कर देखती है
गलियों में जाते, गुल्ली-डंडा घुमाते, गिट्टे उछालते

माँ माँ कहकर लिपट जाते हैं
माँ को सब एक तरह से ही बुलाते हैं

मधुरता में नहला कर, चाव से भर कर
ज़रा-सा डर कर आतुरता से

माँ... माँ... माँ
बछड़ा रंभाता है बां बां बां

गाय कई बार रस्सी तोड़ने का यत्न करती है
मालिक का कोई डर नहीं रहता

कोई भी उलझन हो, कोई भी ख़ुशी हो, कोई भी उम्र हो
कहता है माँ, माँ कहाँ हो तुम माँ

हाय बाप कोई नहीं कहता


What is Pratidin Ek Kavita?

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।

माँ । पद्मा सचदेव

बुलाने के लिए कई नाम हैं

जिसे पुकारो बोलता भी है
पर एक नाम ऐसा है जिसे पुकारो तो

सब चौकन्ने हो जाते हैं
सभी सोचते हैं ये नाम मेरे लिए तो नहीं

माँ... माँ... माँ...
ओ लड़के

ओ बेटा
वह मेरी बेटी

कहाँ मर गई हो
माँ माँ माँ कहता जब कोई बच्चा

गली में से निकलता है
सड़क पार करता है

या पहाड़ चढ़ता है
पहाड़ उतरकर आँगन में आ खड़ा होता है

तब माँ एकदम सुबह के गुलाब की तरह
खिल उठती है

दोनों दरवाज़े थाम कर देखती है
गलियों में जाते, गुल्ली-डंडा घुमाते, गिट्टे उछालते

माँ माँ कहकर लिपट जाते हैं
माँ को सब एक तरह से ही बुलाते हैं

मधुरता में नहला कर, चाव से भर कर
ज़रा-सा डर कर आतुरता से

माँ... माँ... माँ
बछड़ा रंभाता है बां बां बां

गाय कई बार रस्सी तोड़ने का यत्न करती है
मालिक का कोई डर नहीं रहता

कोई भी उलझन हो, कोई भी ख़ुशी हो, कोई भी उम्र हो
कहता है माँ, माँ कहाँ हो तुम माँ

हाय बाप कोई नहीं कहता