Pratidin Ek Kavita

जो मेरे घर कभी नहीं आएँगे | विनोद कुमार शुक्ल 

जो मेरे घर कभी नहीं आएँगे 
मैं उनसे मिलने 
उनके पास चला जाऊँगा। 
एक उफनती नदी कभी नहीं आएगी मेरे घर 
नदी जैसे लोगों से मिलने 
नदी किनारे जाऊँगा 
कुछ तैरूँगा और डूब जाऊँगा 

पहाड़, टीले, चट्टानें, तालाब 
असंख्य पेड़ खेत 
कभी नहीं आएँगे मेरे घर 
खेत-खलिहानों जैसे लोगों से मिलने 
गाँव-गाँव, जंगल-गलियाँ जाऊँगा। 

जो लगातार काम में लगे हैं 
मैं फ़ुरसत से नहीं 
उनसे एक ज़रूरी काम की तरह 
मिलता रहूँगा— 
इसे मैं अकेली आख़िरी इच्छा की तरह 
सबसे पहली इच्छा रखना चाहूँगा। 


What is Pratidin Ek Kavita?

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।

जो मेरे घर कभी नहीं आएँगे | विनोद कुमार शुक्ल

जो मेरे घर कभी नहीं आएँगे
मैं उनसे मिलने
उनके पास चला जाऊँगा।
एक उफनती नदी कभी नहीं आएगी मेरे घर
नदी जैसे लोगों से मिलने
नदी किनारे जाऊँगा
कुछ तैरूँगा और डूब जाऊँगा

पहाड़, टीले, चट्टानें, तालाब
असंख्य पेड़ खेत
कभी नहीं आएँगे मेरे घर
खेत-खलिहानों जैसे लोगों से मिलने
गाँव-गाँव, जंगल-गलियाँ जाऊँगा।

जो लगातार काम में लगे हैं
मैं फ़ुरसत से नहीं
उनसे एक ज़रूरी काम की तरह
मिलता रहूँगा—
इसे मैं अकेली आख़िरी इच्छा की तरह
सबसे पहली इच्छा रखना चाहूँगा।