कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।
प्रार्थना | रचित
ईश्वर,
ध्यान देना…
जब खड़ा होना पड़े मुझे
तो अपने अस्तित्व से ज़्यादा जगह न घेरूँ।
मैं ऋग्वेद के चरवाहों की करुणा के साथ कहता हूँ—
मुझे इस अनंत ब्रह्मांड में
मेरे पेट से बड़ा खेत मत देना,
हल के भार से अधिक शक्ति,
बैल के आनंद से अधिक श्रम मत देना।
मैं तोलस्तोय के किसान से सीख लेकर कहता हूँ :
मुझे मत देना उतनी ज़मीन
जो मेरे रोज़ाना के इस्तेमाल से ज़्यादा हो,
हद से हद एक चारपाई जितनी जगह
जिसके पास में एक मेज़-कुर्सी आ जाए।
मुझे मेरे ज्ञान से ज़्यादा शब्द,
सत्य से ज़्यादा तर्क मत देना।
सबसे बड़ी बात
मुझे सत्य के सत्य से भी अवगत करवाना।
मुझे मत देना वह
जिसके लिए कोई और कर रहा हो प्रार्थना।