Pratidin Ek Kavita

विश्वास बढ़ता ही गया । शिवमंगल सिंह सुमन 

पथ की सरलता देखकर
दो-चार डग जब बढ़ गया
तब दृष्टि-पथ के सामने
आकर हिमालय अड़ गया।
पथ के अथक अभ्यास पर
विश्वास बढ़ता ही गया।

What is Pratidin Ek Kavita?

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।

विश्वास बढ़ता ही गया । शिवमंगल सिंह सुमन

पथ की सरलता देखकर
दो-चार डग जब बढ़ गया
तब दृष्टि-पथ के सामने
आकर हिमालय अड़ गया।
पथ के अथक अभ्यास पर
विश्वास बढ़ता ही गया।