Pratidin Ek Kavita

आदत | गुलज़ार

साँस लेना भी कैसी आदत है
जिए जाना भी क्या रिवायत है

कोई आहट नहीं बदन में कहीं
कोई साया नहीं है आँखों में

पाँव बेहिस हैं चलते जाते हैं
इक सफ़र है जो बहता रहता है

कितने बरसों से कितनी सदियों से
जिए जाते हैं जिए जाते हैं

आदतें भी अजीब होती हैं


What is Pratidin Ek Kavita?

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।

आदत | गुलज़ार

साँस लेना भी कैसी आदत है
जिए जाना भी क्या रिवायत है

कोई आहट नहीं बदन में कहीं
कोई साया नहीं है आँखों में

पाँव बेहिस हैं चलते जाते हैं
इक सफ़र है जो बहता रहता है

कितने बरसों से कितनी सदियों से
जिए जाते हैं जिए जाते हैं

आदतें भी अजीब होती हैं