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कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।
इस घट-अंतर बाग़-बगीचे । कबीर
इस घट-अंतर बाग़-बगीचे इसी में सिरजनहारा
इस घट-अंतर सात समुंदर इसी में नौ लख तारा
इस घट-अंतर पारस मोती इसी में परखनहारा
इस घट-अंतर अनहद गरजै इसी में उठत फुहारा
कहत 'कबीर' सुनो भाई साधो इसी में साईं हमारा