Pratidin Ek Kavita

 विमानस्पर्धी।  ज्ञानेन्द्रपति 

खगपथों पर
पक्षियों से जा टकराते हैं विमान, अन्धाधुन्द
और ध्वन्स का ज़िम्मेदार
पक्षी को ठहराया जाता है
बेसबब बेसब्र चील को
दूर धरती के एक कसाईखाने की धुरी पर गगन मँडराते गिद्ध को
जबकि वे
खगपथों को मेघपथों से जोड़ने वाली आकासी सिवान पर 
तारापथ जहाँ से दीख जाता दिन में ही उन्हें -
अंक रही अंतिम उड़ानें हैं 
पक्षीकुल की
जिन्हें
विमान-कम्पनियों और बीमा-कम्पनियों का अभिशाप-किन्हीं का लाभ  
नीचे, धरती पर, कीटनाशकों का ज़हर  बनकर मार रहा है
उनके अण्डों को तुनुक बनाकर तोड़ रहा है, असमय
घोंसलों में ही बुझा दे रहा है जीवन-जोत, भ्रूण का अनबना गला टीपकर
खेचर प्रजातियों को पोंछ रहा है आकाश से
पंख-भर आकाश के आश्वासन के साथ जिन्हें उपजाया था धरती ने
भेजा था आकाश की सैर पर
जिनके लौट आने का
इंतज़ार करती है धरती
ऊँचे वृक्षों की फुनगियों में रोपे कान
एक बिमान के गर्म लहू से गीली-झुलसी धरती
उस पक्षी का भी शोक करती है
जो लहू की एक बूँद बन चू पड़ा
वह आकाश का आँसू नहीं
धरती की उमंग था ।

What is Pratidin Ek Kavita?

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।

विमानस्पर्धी। ज्ञानेन्द्रपति

खगपथों पर
पक्षियों से जा टकराते हैं विमान, अन्धाधुन्द
और ध्वन्स का ज़िम्मेदार
पक्षी को ठहराया जाता है
बेसबब बेसब्र चील को
दूर धरती के एक कसाईखाने की धुरी पर गगन मँडराते गिद्ध को
जबकि वे
खगपथों को मेघपथों से जोड़ने वाली आकासी सिवान पर
तारापथ जहाँ से दीख जाता दिन में ही उन्हें -
अंक रही अंतिम उड़ानें हैं
पक्षीकुल की
जिन्हें
विमान-कम्पनियों और बीमा-कम्पनियों का अभिशाप-किन्हीं का लाभ
नीचे, धरती पर, कीटनाशकों का ज़हर बनकर मार रहा है
उनके अण्डों को तुनुक बनाकर तोड़ रहा है, असमय
घोंसलों में ही बुझा दे रहा है जीवन-जोत, भ्रूण का अनबना गला टीपकर
खेचर प्रजातियों को पोंछ रहा है आकाश से
पंख-भर आकाश के आश्वासन के साथ जिन्हें उपजाया था धरती ने
भेजा था आकाश की सैर पर
जिनके लौट आने का
इंतज़ार करती है धरती
ऊँचे वृक्षों की फुनगियों में रोपे कान
एक बिमान के गर्म लहू से गीली-झुलसी धरती
उस पक्षी का भी शोक करती है
जो लहू की एक बूँद बन चू पड़ा
वह आकाश का आँसू नहीं
धरती की उमंग था ।