Pratidin Ek Kavita

रहे न कोई भूखा–नंगा | कोदूराम दलित

पराधीन रहकर सरकस का शेर नित्य खाता है कोड़े,
पराधीन रहकर बेचारे बोझा ढोते हाथी-घोड़े ।

माता–पिता छुड़ा, पिंजरे में रखा गया नन्हा–सा तोता,
वह स्वतंत्र उड़ते तोतों को देख सदा मन ही मन रोता ।

चाहे पशु हो, चाहे पंछी परवशता कब, किसको भायी,
कहने का मतलब यह कि ‘परवशता’ होती दुखदायी।

ऐसी दुखदायी परवशता मानव को कैसे भायेगी?
औरों की दासता किसी को राहत कैसे पहुँचायेगी?

जो गुलाम हैं, उन लोगों से उनके दुख: की बातें पूछो,
औ’ हैं जो आज़ाद मुल्क़ के उनके सुख की बातें पूछो।

कहा सयानों ने सच ही है आज़ादी से जीना अच्छा,
किंतु ग़ुलामी में जिंदा रहने से मर जाना है अच्छा।

रह करके गोरों की परवशता में हम क्या-क्या न खो चुके,
पर पंद्रह अगस्त सन सैंतालीस को हम आज़ाद हो चुके।

यह सब अपने अमर शहीदों के भारी जप-तप का फल है,
मिलकर रहें, देश पनपावें तब तो फिर भविष्य उज्जवल है ।

आज़ादी पर आँच न आवे लहर-लहर लहराए तिरंगा,
हम संकल्प आज लेवें कि रहे न कोई भूखा–नंगा।


What is Pratidin Ek Kavita?

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।

रहे न कोई भूखा–नंगा | कोदूराम दलित

पराधीन रहकर सरकस का शेर नित्य खाता है कोड़े,
पराधीन रहकर बेचारे बोझा ढोते हाथी-घोड़े ।

माता–पिता छुड़ा, पिंजरे में रखा गया नन्हा–सा तोता,
वह स्वतंत्र उड़ते तोतों को देख सदा मन ही मन रोता ।

चाहे पशु हो, चाहे पंछी परवशता कब, किसको भायी,
कहने का मतलब यह कि ‘परवशता’ होती दुखदायी।

ऐसी दुखदायी परवशता मानव को कैसे भायेगी?
औरों की दासता किसी को राहत कैसे पहुँचायेगी?

जो गुलाम हैं, उन लोगों से उनके दुख: की बातें पूछो,
औ’ हैं जो आज़ाद मुल्क़ के उनके सुख की बातें पूछो।

कहा सयानों ने सच ही है आज़ादी से जीना अच्छा,
किंतु ग़ुलामी में जिंदा रहने से मर जाना है अच्छा।

रह करके गोरों की परवशता में हम क्या-क्या न खो चुके,
पर पंद्रह अगस्त सन सैंतालीस को हम आज़ाद हो चुके।

यह सब अपने अमर शहीदों के भारी जप-तप का फल है,
मिलकर रहें, देश पनपावें तब तो फिर भविष्य उज्जवल है ।

आज़ादी पर आँच न आवे लहर-लहर लहराए तिरंगा,
हम संकल्प आज लेवें कि रहे न कोई भूखा–नंगा।