Pratidin Ek Kavita

रात में बोट क्लब । हेमंत देवलेकर

रुकी हुई नावें :
जैसे लहरों ने
बेतरतीबी से उतार फैंकी
अपनी जूतियाँ
और समा गई तलघर में
उनकी नींद पर
मछलियों का पहरा है
बंद है पानी का दरवाज़ा 
चाँद उस पर लटका है
ताले की तरह

What is Pratidin Ek Kavita?

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।

रात में बोट क्लब । हेमंत देवलेकर

रुकी हुई नावें :
जैसे लहरों ने
बेतरतीबी से उतार फैंकी
अपनी जूतियाँ
और समा गई तलघर में
उनकी नींद पर
मछलियों का पहरा है
बंद है पानी का दरवाज़ा
चाँद उस पर लटका है
ताले की तरह