कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।
चिपचे दूध से नहलाते हैं आँगन में खड़ा कर के तुम्हें | गुलज़ार
चिपचे दूध से नहलाते हैं आँगन में खड़ा कर के तुम्हें
शहद भी, तेल भी, हल्दी भी, न जाने क्या क्या
घोल के सर पे लँढाते हैं गिलसियाँ भर के...
औरतें गाती हैं जब तीवर सुरों में मिल कर
पाँव पर पाँव लगाए खड़े रहते हो इक पथराई-सी मुस्कान लिए
बुत नहीं हो तो, परेशानी तो होती होगी!
जब धुआँ देता, लगाता पुजारी
घी जलाता है कई तरह के छोंके देकर
इक ज़रा छींक ही दो तुम,
तो यक़ीं आए कि सब देख रहे हो!