कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।
रिश्तेदारी | लक्ष्मीशंकर वाजपेयी
नहीं, यह भी संभव नहीं होता
कि उनके शहर जाकर भी
जाया ही न जाय रिश्तेदारों के घर
अकसर कुछ एहसान लदे होते हैं
उनके बुज़ुर्गों के अपने बुज़ुर्गों पर
ऐसा कुछ न भी हो, तो
ज़रूरी होता है लोकाचार निभाना
किंतु अकसर खड़ी हो जाती है समस्या
कि पत्नी की कुशलक्षेम, बच्चों की
सुचारू पढ़ाई का विवरण दे देने
तथा ’और क्या हाल-चाल हैं‘ का कई-कई बार
उत्तर दे देने के बाद,
कैसे जारी रखा जाय संवाद
अकसर बोझिल हो जाते हैं
चाय आने के बीच के क्षण,
और अकसर देर लगती है चाय आने में
क्योंकि उधर से भी रिश्तेदारी निभाने के प्रयास
प्रकट होते हैं चाय के साथ की सामग्री बनकर
चाय के बाद बनती है कुछ राहत की स्थिति
कि अब कुछ देर बाद
माँगी जा सकती है आज्ञा
और खाना खाकर जाने की मनुहार पर
कुछ बहाने बनाकर
उठा जा सकता है कुछ औपचारिक संबोधनों
तथा फिर मिलने-जुलने
या चिट्ठी लिखने के वादों के साथ!