Pratidin Ek Kavita

बिन घरनी घर भूत का डेरा । आभा बोधिसत्व

हज़ारों ग्रहों में
यह धरती बहुत छोटी-सी है,

हज़ारों घरों में
बहुत छोटा है

तुम्हारा घर
तुम्हारा छोटा-सा घर था,

ढेर सारे छोटे-छोटे समानों से भरा
फिर भी तुम्हारा मन नहीं

लगता था उससे
तुमने अपने मनोरथ के लिए,

लिया मेरा साथ,
क्योंकि

बिना घरनी के तुम्हारा घर था
भूत का डेरा

What is Pratidin Ek Kavita?

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।

बिन घरनी घर भूत का डेरा । आभा बोधिसत्व

हज़ारों ग्रहों में
यह धरती बहुत छोटी-सी है,

हज़ारों घरों में
बहुत छोटा है

तुम्हारा घर
तुम्हारा छोटा-सा घर था,

ढेर सारे छोटे-छोटे समानों से भरा
फिर भी तुम्हारा मन नहीं

लगता था उससे
तुमने अपने मनोरथ के लिए,

लिया मेरा साथ,
क्योंकि

बिना घरनी के तुम्हारा घर था
भूत का डेरा