Pratidin Ek Kavita

नहीं दूँगा नाम | नंदकिशोर आचार्य 

नहीं दूँगा तुम्हें कोई नाम।
जूही की कली,
कलगी बाजरे की छरहरी,
या और कुछ।
नाम देना पहचान को जड़ करना है
मैं तो तुम्हें
हर बार आविष्कृत करता हूँ।
नाम देकर तुम्हे तीसरा नहीं करूँगा
क्यों कि तुम सम्पूर्ण मेरी हो
तुम्हें तुम ही कहूँगा
कोई नाम नहीं दूँगा।


What is Pratidin Ek Kavita?

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।

नहीं दूँगा नाम | नंदकिशोर आचार्य

नहीं दूँगा तुम्हें कोई नाम।
जूही की कली,
कलगी बाजरे की छरहरी,
या और कुछ।
नाम देना पहचान को जड़ करना है
मैं तो तुम्हें
हर बार आविष्कृत करता हूँ।
नाम देकर तुम्हे तीसरा नहीं करूँगा
क्यों कि तुम सम्पूर्ण मेरी हो
तुम्हें तुम ही कहूँगा
कोई नाम नहीं दूँगा।