Pratidin Ek Kavita

कुछ इश्क़ किया कुछ काम किया/ फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

कुछ इश्क़ किया कुछ काम किया
वो लोग बहुत ख़ुश-क़िस्मत थे

जो इश्क़ को काम समझते थे
या काम से आशिक़ी करते थे

हम जीते-जी मसरूफ़ रहे
कुछ इश्क़ किया कुछ काम किया

काम इश्क़ के आड़े आता रहा
और इश्क़ से काम उलझता रहा

फिर आख़िर तंग आ कर हम ने
दोनों को अधूरा छोड़ दिया


What is Pratidin Ek Kavita?

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।

कुछ इश्क़ किया कुछ काम किया/ फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

कुछ इश्क़ किया कुछ काम किया
वो लोग बहुत ख़ुश-क़िस्मत थे

जो इश्क़ को काम समझते थे
या काम से आशिक़ी करते थे

हम जीते-जी मसरूफ़ रहे
कुछ इश्क़ किया कुछ काम किया

काम इश्क़ के आड़े आता रहा
और इश्क़ से काम उलझता रहा

फिर आख़िर तंग आ कर हम ने
दोनों को अधूरा छोड़ दिया