कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।
वसंतसेना | श्रीकांत वर्मा
सीढ़ियाँ चढ़ रही है
वसंतसेना
अभी तुम न समझोगी
वसंतसेना
अभी तुम युवा हो
सीढ़ियाँ समाप्त नहीं
होती
उन्नति की हों
अथवा
अवनति की
आगमन की हों
या
प्रस्थान की
अथवा
अवसान की
अथवा
अभिमान की
अभी तुम न
समझोगी
वसंतसेना
न सीढ़ियाँ
चढ़ना
आसान है
न
सीढ़ियाँ
उतरना
जिन सीढ़ियों पर
चढ़ते हैं, हम,
उन्हीं सीढ़ियों से
उतरते हैं, हम
निर्लिप्त हैं सीढ़ियाँ,
कौन चढ़ रहा है
कौन उतर रहा है
चढ़ता उतर रहा
या
उतरता चढ़ रहा है
कितनी चढ़ चुके
कितनी उतरना है
सीढ़ियाँ न गिनती हैं
न सुनती हैं
वसंतसेना।