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कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।
हर बार दीवार। ज्योत्स्ना मिलन
आसमान होगा की उम्मीद में
बाहर देखती खिड़की से
बाहर
दीवार होती सामने
और होती
फाँक भर धूप
दो दीवारों के बीच धरी-सी
दीवार की जगह
आसमान नहीं निकला कभी
घास का मैदान भी नहीं
खिड़की के बाहर
हर बार
एक दीवार
आसमान के बदले।