कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।
जिसको बचपन में देखा । माधव कौशिक
जिसको बचपन में देखा वो पनघट पोखर ढूंढूंगा।
अगली बार गाँव में जाकर फिर अपना घर ढूंढूंगा।
ऐसा लगता है टाँगे ही टाँगे हैं अब लोगों की,
मुझको मौका मिला तो सबके कटे हुए सर ढूंढूंगा।
शहरों की शैतानी आँतें लीले गईं हर चीज़ मगर,
दिल की बच्चों जैसी ज़िद के तितली के पर ढूंढूंगा।
बुरे दिनों ने सिख लायी है जीने की तरकीब नई,
जो कुछ चौराहे पर खोया घर के अन्दर ढूंढूंगा।
तुम मेरे चेहरे पर लिखना इन्द्रधनुष उम्मीदों के,
मैं तेरी सूनी आँखों में नीला अम्बर ढूंढूंगा।
हो सकता है मुझे देखकर फिर छिप जाए जँगल में,
मैं अपनी खोई फितरत को भेस बदलकर ढूंढूंगा।
अगली बार गाँव में जाकर फिर अपना घर ढूंढूंगा।