Pratidin Ek Kavita

ओ शहर! | जसिंता केरकेट्टा

भागते हुए छोड़कर अपना घर
पुआल, मिट्टी और खपरे
पूछते हैं अक्सर
ओ शहर!
क्या तुम कभी उजड़ते हो
किसी विकास के नाम पर?


What is Pratidin Ek Kavita?

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।

ओ शहर! | जसिंता केरकेट्टा

भागते हुए छोड़कर अपना घर
पुआल, मिट्टी और खपरे
पूछते हैं अक्सर
ओ शहर!
क्या तुम कभी उजड़ते हो
किसी विकास के नाम पर?