Pratidin Ek Kavita

माँ । अमिताभ

हालाँकि मैं सबसे छोटा था
ग़रीब दुर्बल

पर माँ सर्वाधिक मेरे हिस्से में आई
मैं ही था उसका अशिष्ट सेवक

लापरवाह प्रेमी
मैं ही अकेला चूम सकता था उसके गाल

वही जानती थी बस कि मैं कवि हूँ

What is Pratidin Ek Kavita?

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।

माँ । अमिताभ

हालाँकि मैं सबसे छोटा था
ग़रीब दुर्बल

पर माँ सर्वाधिक मेरे हिस्से में आई
मैं ही था उसका अशिष्ट सेवक

लापरवाह प्रेमी
मैं ही अकेला चूम सकता था उसके गाल

वही जानती थी बस कि मैं कवि हूँ