Pratidin Ek Kavita

दुख | प्रियाँक्षी मोहन

पिताओं के दुख
माँओं के दुखों से
मुख़्तलिफ़ होते हैं।
वे कभी भी प्रत्यक्ष
रूप से नहीं दिखते
वे चूहों से झाँकते हैं
अधजली सिगरेटों से
खूटियों पर टंगी हुई
थकी कमीज़ों से,
पुरानी ऐनकों से,
और बिजली व जल
विभाग के निरंतर
बह रहे बिलों से

What is Pratidin Ek Kavita?

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।

दुख | प्रियाँक्षी मोहन

पिताओं के दुख
माँओं के दुखों से
मुख़्तलिफ़ होते हैं।
वे कभी भी प्रत्यक्ष
रूप से नहीं दिखते
वे चूहों से झाँकते हैं
अधजली सिगरेटों से
खूटियों पर टंगी हुई
थकी कमीज़ों से,
पुरानी ऐनकों से,
और बिजली व जल
विभाग के निरंतर
बह रहे बिलों से