Pratidin Ek Kavita

मौत भी हम से ख़फ़ा हो जैसे। तलअत सिद्दीक़ी नह्टोरी

मौत भी हम से ख़फ़ा हो जैसे
ज़िंदगी एक सज़ा हो जैसे

दिल के वीराने में वो यूँ आए
फूल सहरा में खिला हो जैसे

अपनी बर्बादी पे शर्मिंदा हूँ
ये भी मेरी ही ख़ता हो जैसे

अहमियत ये है तुम्हारे ख़त की
मेरी क़िस्मत का लिखा हो जैसे

दिल मिरा यूँ हुआ पारा-पारा
आइना टूट गया हो जैसे

तुम मुझे हाथ उठा कर कोसो
कोई मसरूफ़-ए-दुआ* हो जैसे
मसरूफ़-ए-दुआ: प्रार्थना में व्यस्त

उन के चेहरे पे वो अश्कों की नमी
फूल शबनम से धुला हो जैसे

बे-वजह मुझ से बिगड़ बैठे हैं
मैं ने कुछ उन को कहा हो जैसे

न तवज्जो न पयाम और सलाम
मुझ से वो रूठ गया हो जैसे

मौज-ए-बेबाक* की मानिंद* हैं वो
कोई तूफ़ाँ में पला हो जैसे
मौज-ए-बेबाक: स्वतंत्र लहर
मानिंद: की तरह

वो ख़फ़ा हो के बहुत शरमाए
आइना देख लिया हो जैसे

ऐसे अंजान बने वो 'तलअ'त'
मेरा शिकवा न सुना हो जैसे


What is Pratidin Ek Kavita?

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।

मौत भी हम से ख़फ़ा हो जैसे। तलअत सिद्दीक़ी नह्टोरी

मौत भी हम से ख़फ़ा हो जैसे
ज़िंदगी एक सज़ा हो जैसे

दिल के वीराने में वो यूँ आए
फूल सहरा में खिला हो जैसे

अपनी बर्बादी पे शर्मिंदा हूँ
ये भी मेरी ही ख़ता हो जैसे

अहमियत ये है तुम्हारे ख़त की
मेरी क़िस्मत का लिखा हो जैसे

दिल मिरा यूँ हुआ पारा-पारा
आइना टूट गया हो जैसे

तुम मुझे हाथ उठा कर कोसो
कोई मसरूफ़-ए-दुआ* हो जैसे
मसरूफ़-ए-दुआ: प्रार्थना में व्यस्त

उन के चेहरे पे वो अश्कों की नमी
फूल शबनम से धुला हो जैसे

बे-वजह मुझ से बिगड़ बैठे हैं
मैं ने कुछ उन को कहा हो जैसे

न तवज्जो न पयाम और सलाम
मुझ से वो रूठ गया हो जैसे

मौज-ए-बेबाक* की मानिंद* हैं वो
कोई तूफ़ाँ में पला हो जैसे
मौज-ए-बेबाक: स्वतंत्र लहर
मानिंद: की तरह

वो ख़फ़ा हो के बहुत शरमाए
आइना देख लिया हो जैसे

ऐसे अंजान बने वो 'तलअ'त'
मेरा शिकवा न सुना हो जैसे