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कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।
दस से ऊपर। सरवत हुसैन
इतने घर
इतने सय्यारे
कंकर पत्थर कौन गिने
दस से ऊपर कौन गिने
औज़ारों के नाम बहुत हैं
हथियारों के दाम बहुत हैं
ऐ सौदागर कौन गिने
दस से ऊपर कौन गिने
ऐ दिल
ऐ बे-कल फ़व्वारे
कितने घाव बने हैं प्यारे
अपने अंदर कौन गिने
दस से ऊपर कौन गिने
कितनी लहरें टूट गई हैं बीच समुंदर कौन गिने