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कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।
यह कैसी विवशता है—
किसी पर वार करो
वह हँसता रहता
या विवाद करता।
यह कैसी पराजय है—
कहीं घाव करें
रक्त नहीं
केवल मवाद बहता।
अजीब वक़्त है—
बिना लड़े ही एक देश का देश
स्वीकार करता चला जाता
अपनी ही तुच्छताओं की अधीनता!
कुछ तो फ़र्क़ बचता
धर्मयुद्ध और कीटयुद्ध में—
कोई तो हार-जीत के नियमों में
स्वाभिमान के अर्थ को
फिर से ईजाद करता।