कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।
गर हम ने दिल सनम को दिया | नज़ीर अकबराबादी
गर हम ने दिल सनम को दिया फिर किसी को क्या
इस्लाम छोड़ कुफ़्र लिया फिर किसी को क्या
क्या जाने किस के ग़म में हैं आँखें हमारी लाल
ऐ हम ने गो नशा भी पिया फिर किसी को क्या
आफी किया है अपने गिरेबाँ को हम ने चाक
आफी सिया सिया न सिया फिर किसी को क्या
उस बेवफ़ा ने हम को अगर अपने इश्क़ में
रुस्वा किया ख़राब किया फिर किसी को क्या
दुनिया में आ के हम से बुरा या भला 'नज़ीर'
जो कुछ कि हो सका सो किया फिर किसी को क्या